Friday, 31 July 2020

प्रेमचंद... एक पत्र



मेरे प्रिय लेखक प्रेमचंद जी,

यूँ तो आपसे मेरा प्रथम परिचय आपकी लिखी कहानी 
'बड़े घर की बेटी' से हुआ। हाँ हाँ जानती हूँ आप मुझे नहीं जानते हैं परंतु मैं आपको आपकी कृतियों के माध्यम से बहुत 
अच्छे से जानती हूँ और आज तक आपके विस्तृत विचारों के नभ की अनगिनत परतों को पढ़कर समझने का प्रयास करती रहती हूँ। खैर अपनी कहानी फिर किसी दिन कहूँगी आपसे आज आपको पत्र लिखने का उद्देश्य यह है कि आज आपका 140 वां जन्मदिन है। 
पता है हर छोटा बड़ा साहित्यिक मंच आपको दिल से 
याद कर रहा है पूरी श्रद्धा से भावांजलि अर्पित कर रहा है। 
आज के दौर में भी प्रासंगिक 
आपकी लिखी कहानियों के पात्रों के भावों से भींजे 
पाठक रह-रहकर वही पन्ने पलटते हैं जिसमें आपने 
आम आदमी को नायक गढ़ा था। आज के साहित्यकारों का विशाल समूह जब अपने दस्तावेजों को ऐतिहासिक फाइलों में जोड़ने के हर संभव अथक 
मेहनत कर रहा है तब आपकी क़लम बहुत याद रही है।
और हाँ आज आपसे आपकी एक शिकायत भी करनी है मुझे।

जीवनभर अभाव, बीमारी और अन्य मानसिक,शारीरिक 
और आर्थिक यंत्रणाएँ सहकर विचारों के अखंड तप से 
जो सच्चे मोती आपने प्राप्त किया उसे धरोहर के रूप में आने वाली पीढ़ियों को सौंप गये किंतु आपके जाने के बाद वो क़लम जिससे आपने अनमोल ख़ज़ाना संचित किया है वो जाने आपने कहाँ रख दी किसी को बताया भी नहीं उसका पता तभी तो किसी को भी नहीं मिली आजतक। किसी को तो दे जाना चाहिए था न!
क्या कोई योग्य उत्तराधिकारी न मिला आपको.. 
जिसे अपनी क़लम आप सौंप जाते?
या फिर आपकी संघर्षशील क़लम के पैनापन से लहुलूहान होने का भय रहा या  फिर क़लम का भार वहन करने में कोई हथेली सक्षम न थी?
जिस तरह आपकी कृतियों को संग्रहित करने का प्रयास करते रहे आपके प्रशंसक और अनुयायी उस तरह आपकी क़लम को जाने क्यों नहीं ढूँढकर सहेज पाये।
आपके जाने के बाद उस चमत्कारी क़लम की नकल की अनेक प्रतियाँ बनी किंतु आपकी क़लम की स्याही से निकली क्रांति,ओज और प्रेरणा की तरह फिर कभी न मिल पायीं। जाने कहाँ ग़ुम हो गयी क़लम आपकी।
चलिए अब क़लम न सही आपकी बेशकीमती कृतियाँ तो हैं ही जो किसी भी लेखक की सच्ची मार्गदर्शक बन सकती है।
आपसे अनुरोध है कि आप अपने अनुयायियों और  
प्रशंसकों तक यह संदेश पहुँचा दीजिये न कृपया
ताकि हो सके तो आपका गुणगान करने के साथ -साथ
आपके लिखे संदेश का क्षणांश आत्मसात भी करें
और समाज के साधारण वर्ग की आवाज़ बनकर लेखक होने का धर्म सार्थक कर जायें।
आज बस इतना ही बाकी बातें फिर कभी लिखूँगी।

आपकी एक प्रशंसक



Saturday, 14 September 2019

हिंदी


किसी त्योहार ,पूजा के अवसर पर पंडालों से लेकर गली मुहल्लों तक , लगभग एक-सा उबाऊ और नीरस कानफोड़ू लाउडस्पीकर पर बजते गानों की तरह "हिंदी दिवस"के शोर से दिल-दिमाग लगभग शून्य हो गया है। 

हिंदी दिवस !हिंदी दिवस! हिंदी दिवस!
यह जाप करने से हिंदी का उद्धार अगर संभव होता तो फिर क्या कहना था।

सदियों से आतातायियों की संस्कृति को पोषित और आत्मसात करते हुये, जबरन थोपी गयी उनकी सभ्यता को हमने समय के साथ अपनी संस्कृति की आत्मा में मिला लिया सालों जीते रहे वैसे ही अब परिवर्तन की माला फेरने से कुछ कैसे बदल सकता है??

पेड़ के पत्तों पर कीटनाशक का छिड़काव करने से 
समस्या का समाधान कैसे संभव जब जड़ ही संक्रमित हो।

आज़ादी के पहले अंग्रेजों का शासनकाल रहा,उनके जाने के बाद देश के भविष्य निर्माताओं के द्वारा हिंदी राजभाषा बनाकर संविधान में लागू कर दिया गया और जिम्मेदारी समाप्त हो गयी। पर क्या शिक्षा व्यवस्था में हिंदी को मजबूत करने का कोई प्रयास किया गया? शिक्षित सुसंस्कृत और कुलीन व्यक्ति की पहचान ही अंग्रेजी बनने लगी।  हमारी शिक्षा-व्यवस्था में अंग्रेजी को जितनी आत्मीयता मिली हिंदी उतनी ही पिछड़ती गयी। अंग्रेजी माध्यम के 
स्कूलों की जड़ों को और गहरा करके, संरक्षित और पोषित किया गया। कुकुरमुत्तों की तरह अंग्रेजी माध्यम के स्कूल खुलने लगे और अंग्रेजी को ही उज्जवल भविष्य की कुंजी माना जाने लगा तब तो किसी ने हिंदी के भविष्य के संबध में क्यों नहीं सोचा? तब विरोध क्यों न किया गया?

हिंदी माध्यम स्कूलों के पाठ्य पुस्तकों में विज्ञान,गणित,कला इत्यादि से संबंधित पुस्तकों को औपचारिकता बनाकर क्यों रखा गया? अलग-अलग लेखकों ने इन विषयों पर जो पुस्तकें लिखी उसकी उपलब्धता की संख्या गिनी-चुनी क्यों रखी गयी? जबकि अंग्रेजी माध्यम में इसकी संख्या अनगिनत है। सवाल अनगिनत है जड़ में।

अब जब अंग्रेजी देश के रग-रग में समा चुकी है तो हिंदी पखवाड़े या हिंदी दिवस के अवसर पर इसका विरोध करने का कोई तुक नहीं है। विरोध करके कुछ होना भी नहीं है। सब महीनेभर का प्रदर्शन बनकर रह जाता है मात्र दिवस के लिए।

समय के साथ हुये परिवर्तन को नकार नहीं सकते हैं। इंद्रधनुषी संस्कृति की चुनरी ओढ़े हमारे देश में अलग प्रदेशों में रहने वाले लोगों की लोकसंस्कृति, बोली,व्यवहार,पहनावा ही खूबसूरती है और अब अंग्रेजी को भी अपनाया जा चुका है। हमारे दैनिक जीवन के क्रिया-कलाप हिंदी होते हुये भी अंग्रेजियत से प्रभावित हो चुके है। हिंदी की आत्मा में अंग्रेजी को अनाधिकार प्रवेश मिल चुका है।
ये तो मानते है न कि जबर्दस्ती कुछ भी मनवाया नहीं जा सकता है जबरन नियम या कानून थोपा गया हो तो इसका प्रभाव जल्दी ही निष्क्रिय हो जाता है। 
आज जरूरत है हम हिंदी को मन से अपनाये।
बेहतरी इसी में है कि बची हुई हिंदी की धरोहर को
 पूरा सम्मान और संरक्षण दिया जाय।

मुझे तो लगता है हिंदी मात्र साहित्य तक ही सिमटकर रह गयी है। हिंदी का मतलब कविता कहानी,कुछ लेख और फिल्मी गीत। मतलब अब हिंदी मनोरंजन तक सीमित होने लगी है। 

अरे हाँ सबसे गंभीर समस्या की बात करना ही भूल गये "हिंदी साहित्य में बढ़ता भदेसपन।"
हिंदी फिल्म के संवाद हो, गीत हो या किसी हिंदी राष्ट्रीय समाचार चैनल का खुला बहस मंच सभी जगह धड़ल्ले से अपशब्दों के प्रयोग ने हिंदी भाषा का चेहरा बिगाड़कर रख दिया है।
साहित्य के पुरोधा तथाकथित झंडाबरदार जब किसी व्यक्ति ,घटना या रचना को न्यायाधीश बनकर उसका विश्लेषण करते हैं तो खूब जमकर गालियों के प्रयोग करते है। लोग सहज रुप से अभिव्यक्ति की आज़ादी या सच कहने वाला  प्रतिनिधि बताकर किसी के लिए भी कुछ भी अमर्यादित अपशब्द लिखते और बोलते नज़र आते है और बेशर्मी से व्यंग्य का नाम दे देते हैं। व्यंग्य लिखना और मखौल उड़ाने में एक सूतभर का अंतर होता है। पर हम इनका भी विरोध नहीं करते बस हिंदी दिवस का ढोल पीटते है। 

एक बात प्रमाणित है हिंदी साहित्य के छोटे-बड़े सभी लेखकों ने बागडोर थामी हुई है हिंदी के भविष्य के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझते हुये।
हमारे देश के ग्यारह हिंदी भाषी राज्यों में बोली जाने वाली विविधापूर्ण हिंदी प्रचलित भाषा में मिश्रित करके बोली जाती है। जैसे उत्तरप्रदेश से बिहार आते-आते हिंदी में गवईंपन बढ़ जाता है।  हिंदी भाषा की शुद्धता का मानक स्तर तय करने का दारोमदार हिंदी साहित्य पर है। हिंदी पत्रिकाएँ और युवा साहित्यकारों की बढ़ती संख्या एक सकारात्मक संकेत है, पर अगर वो भाषा की शुद्धियों पर ध्यान दें तो और भी सुखद होगा हम उम्मीद कर सकते है कि हिंदी की शिथिल पड़ती धुकधुकाती साँसों में प्रयासों द्वारा अब भी कृत्रिम उपकरणों की मदद से ऑक्सीजन भरकर नवजीवन प्रदान किया जा सकता हैं। 

#श्वेता सिन्हा

Saturday, 15 June 2019

मेरी बिटिया के पापा


कल रात को अचानक नींद खुल गयी, बेड पर तुम्हें न पाकर मिचमिचाते आँखों से सिरहाने रखा फोन टटोलने पर टाईम देखा तो 1:45 a.m हो रहे थे।बेडरूम के भिड़काये दरवाजों और परदों के नीचे से मद्धिम रोशनी आ रही थी , शायद तुम ड्राईंंग रूम में हो, आश्चर्य और चिंता के मिले जुले भाव ने मेरी नींद उड़ा दी। जाकर देखा तो तुम सिर झुकाये एक कॉपी में कुछ लिख रहे थे।इतनी तन्मयता से कि मेरी आहट भी न सुनी।
ओह्ह्ह....,ये तो बिटिया की इंगलिश  लिट्रेचर की कॉपी है! तुम उसमें कुछ करैक्शन कर रहे थे।कल उसने एक निबंध लिखा था बिना किसी की सहायता के और तुमसे पढ़ने को कहा था , तब तुमने उससे वादा किया था आज जरूर पढ़ोगे, पर तुम्हारी व्यस्त दिनचर्या की वजह से आज भी तुम लेट ही आये और निबंध नहीं देख पाये थे। मैंने धीरे से तुम्हारा कंधा छुआ तो तुमने चौंक कर देखा और शांत , हौले से  मुस्कुराते हुये कहा कि ' उसने इतनी मेहनत से खुद से कुछ लिखा है अगर कल पर टाल देता तो वो निराश हो जाती न।'
ऐसी एक नहीं अनगिनत घटनाएँ और छोटी-छोटी बातें है बिटिया के लिए तुम्हारा असीम प्यार अपने दायित्व के साथ क़दमताल करता हुआ दिनोंंदिन बढ़ता ही जा रहा है। उसके जन्म के बाद से ही एक पिता के रूप में  तुमने हर बार विस्मित किया है।
मुझे अच्छी तरह याद है बिटिया के जन्म के बाद पहली बार जब तुमने उसे छुआ था तुम्हारी आँखें भींग गयी थी आनंदविभोर उसकी उंगली थामें तुम तब तक बैठे रहे जब तक अस्पताल के सुरक्षा कर्मियों ने आकर मरीजों से मिलने का समय समाप्त हो गया  कहकर जाने को नहीं कहा। उसकी एक छींक पर मुझे लाखों हिदायतें देना,उसकी तबियत खराब होने पर रात भर मेरे साथ जागना बिना नींद की परवाह किये जबकि मैं जानती हूँ 5-6  घंटों से ज्यादा सोने के लिए कभी तुम्हारे पास वक्त नहीं होता। उसके पहले जन्मदिन से ही भविष्य के सपनों को पूरा करने के लिए न जाने क्या-क्या योजनाएँँ बनाते रहे। बिटिया भी तो... उसकी कोई बात बिना पापा को बताये पूरी कब होती है! जितना भी थके हुए रहो तुम पर जब तक दिन भर की सारी बातें न कह ले तुम्हें दुलार न ले सोती ही नहीं, तुम्हारे इंतज़ार में छत से अनगिनत बार तुम्हारी गाड़ी झाँक आती है। 'मम्मा पा फोन किये थे क्या उनको लेट होगा? अब तक आये क्यों नहीं..? तुम्हारे आने के समय में देर हो तो अपना फेवरेट टी.वी. शो भूलकर सौ बार सवाल करती रहती है।'
जब तुम दोनों मिलकर मेरी हँसी उड़ाते मुझे चिढ़ाते हो,खिलखिलाते हो... भले ही मैं चिड़चिडाऊँ पर मन को मिलता असीम आनंद शब्दों में बता पाना मुश्किल है।

तुम दोनों का ये प्यार देखकर मेरे पापा के प्रति मेरा प्यार और गहरा हो जाता है, जो भावनाएँ मैं नहीं समझ पाती थी उनकी, अब सारी बातें समझने लगी हूँ उन सारे पलों को फिर से जीने लगी हूँ।
पापा को कभी नहीं बता पायी मैं उनके प्रति मेरी भावनाएँ, पर आज सोच रही हूँ कि इस बार उनसे जाकर जरूर कहूँगी कि उनको मैं बहुत प्यार करती हूँ।

तुम्हें अनेको धन्यवाद देना था ,नहीं तुम्हारी बेटी के प्रति तुम्हारे प्यार के लिए नहीं बल्कि मेरे मेरे पापा के अनकहे शब्दों को उनकी अव्यक्त भावनाओं को तुम्हारे द्वारा समझ पाने के लिए।

  #श्वेता सिन्हा

Friday, 14 June 2019

भूटान यात्रा-2

जयगाँव स्थित भूटान-प्रवेश द्वार
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हम जिस गाड़ी में सवार हुये उसमें हम तीन लोग यानि मैं,मेरी बिटिया और उसके पापा के साथ एक सरदार अंकल-आंटी,एक बंगाली अंकल-आंटी थे।
ड्रॉइवर मिलाकर कुल 8 लोग।
सबके साथ उनसे औपचारिक परिचय हुआ,फिर हमारा ड्रॉइवर जिसका नाम 'संगीत' था उससे बातें हुई।
मंझोले कद का दुबला पतला भारतीय जो भूटानी जैसा दिख रहा था। बहुत खुशमिजाज लगा, भूटान के बारे में उसे खासी जानकारी थी।
  हमलोग को जयगाँव के लिए निकलने में करीब साढ़े दस बज गये थे। उत्साह से लबरेज हंसते बतियाते समसामयिक विषयों कर चर्चा करते करीब डेढ़ घंटें के बाद हम जयगाँव की सीमा में प्रवेश किये। एक साधारण भारतीय अर्द्धविकसित कस्बाई माहौल लगा।
  सड़क के दोनों ओर अनगिनत ब्रांडेड और नान ब्रांडेड बड़ी-छोटी दुकानें सजी हुई थी रोजमर्रा के सामान के अलावा जरुरत की हर छोटी बड़ी वस्तुएं आसानी से उपलब्ध थी। कुछ भूटानी औरतें,लड़कियाँ खरीदारी करते सामान लिये आधुनिक कपड़ों में सड़कों पर दिख रहीं थी।
 उमस भरा मौसम था। भूटान की सीमा के इस पार कुछ मीटर की दूरी में एक होटल में हमारे रहने का प्रबंध था। सब लोग अति उत्साहित हो रहे थे। हमारे साथ इस घुमक्कड़ ग्रुप में करीब 34 लोग सम्मिलित थे। 
 रिसेप्शन लॉबी में सब तरह तरह की बातें कर रहे थे। रविवार होने की वजह से इमीग्रेशन ऑफिस बंद है जहाँ से हमें भूटान प्रवेश करने के लिए परमिट मिलेगा। अतः आज यही जयगाँव में रुकना है।
 भूटान के मौसम को लेकर सब बढ़-चढ़कर ज्ञान बघार रहे थे...शायद अंदर बारिश हो रही है और टेंपरेचर कम है ऐसा सुनकर कुछ लोग होटल रुम में सामान रखकर छतरी और विंडचिटर खरीदने निकल गये। हम तो अपने साथ गर्म कपड़े लेकर आये थे इसलिए निश्चिंत थे।
बाहर बहुत धूप और उमस थी इसलिए हमने सोचा कि शाम को निकलेंगे घूमने।
हाँलाकि आस-पास के बड़े-बड़े शो रुम, फुटपाथी दुकान कपड़े,जूते,क्रॉकरी और भी मन लुभाते आकर्षक सजावटी वस्तुओं ने और खास कर भूटान का प्रवेश द्वार देखने की उत्सुकता और मीठी की ज़िद ने हमें बाध्य कर दिया कि एक छोटा चक्कर लगा ही आया जाय।
 बाज़ार में खासी चहल-पहल थी थोड़ी दूर ही गये कुछ सजावटी वस्तुओं के सामान के दाम पूछे जो सामान्य लगे पर अनवरत गिरते पसीने और उमस से बेहाल हम ज्यादा न घूम सके। भूटान का द्वार को इस पार से देख-देख कर आहृलादित होकर सपने बुनते हम आइसक्रीम खाकर वापस आ गये।
 दोपहर का भोजन कर आराम कर रहे थे करीब चार बजे हमें रिसेप्शन हॉल में बुलवाया।
 हमारे ट्रिप संयोजक ने एक एजेंट बुलाया था (एक छोटे कद की भूटानी लड़की थी) जो हमारा भूटानी वीज़ा बनवाने में सहायक होती।
 वह ऐजेंट बारी-बारी से सबका पहचान-पत्र देख रही थी। पहचान-पत्र यानि वोटर आई डी या पासपोर्ट आधार कार्ड मान्य नहीं है।
 हम दोनों का वोटर आई डी  भी ओके था परंतु मीठी का आधार कार्ड,स्कूल आई डी या स्कूल डायरी मान्य नहीं था उसका बर्थ सर्टिफिकेट चाहिये
 वरना उसका प्रवेश परमिट नहीं बनेगा अब बर्थ सर्टिफिकेट जो कि हमारे पास फिलहाल मौजूद नहीं था। अब क्या करेंगे? कुछ पल के लिए हम स्वीच ऑफ हो गये। मीठी का रोना शुरु हो गया सुबक-सुबक कर। "हम को भी जाना है भूटान"।
 दूसरी सुबह सब 8 बजे इमीग्रेशन के लिए भूटान प्रवेश द्वार पर स्थित भूटानी शहर फेत्सुलिंग इमीग्रेशन ऑफिस पहुँचना था और हमारे पास सर्टिफिकेट नहीं था। मेरे फ्लैट पर और कोई नहीं था चाभियाँ मेड के पास थी। अगर किसी को भेजकर फ्लैट खुलवा भी लेते तो बर्थ सर्टिफिकेट के साथ अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं इसकी चिंता थी।
 कुछ सूझ नहीं रहा था कैसे इतनी जल्दी इंतजाम हो। शाम हो गयी थी सब जयगाँव घूमने निकल रहे थे हमारा तो मन ही उतर गया था और मीठी का रोना शुरु हो गया सुबक-सुबक कर। "हम को भी जाना है भूटान"।
 उसके पापा चिढ़ा रहे थे "हमलोग एक काम करते है तुम्हारे लिये इस होटल में सब इंतजाम कर देते हैं तुम रहो हमलोग घूमकर तुमको लेते जायेगे।"
 उसका बुक्का फाड़कर रोना और तेज़ हो जाता।
 अच्छा चलो छोड़ो ये सब हम लोग दार्जिलिंग और गंगटोक घूम आते हैं। चिढ़कर और रोने लगती वो।

 काफी सोच कर "इन्होंने" स्कूल की एक टीचर और अपने एल आइ सी एजेंट को को फोन किया।
 स्कूल चूँकि बंद था पर ऑफिस कुछ घंटों के लिए खुलता था उस टीचर ने कहा "सर आप परेशान न हो कल सुबह सबसे पहले स्कूल जाकर सर्टिफिकेट की कॉपी भेज देंगे।
 "एल आई सी वाले न भी कहा ऑफिस जाकर देखते है भैया।"
 थोड़ी उम्मीद की किरण जागी तो मन हल्का हुआ।
 मीठी को काफी मान मनौव्वल के बाद थोड़ा घूमने निकले। शाम की रौनक अच्छी लग रही थी।
 हमारे साथ आये लोग शॉपिंग कर रहे थे ,हमने कुछ नहीं खरीदा कौन लगेज़ भारी करे अभी से ही।
 वापस जल्दी ही लौट आये,अपने कमरे में आकर 
 वहीं हल्का फुल्का डिनर किये।
 अनमने मन से सब बिस्तर में दुबक गये।
 पर सुबह क्या होगा इस इंतजार में करवट बदलते कोई सो ही नहीं पाया।
क्रमश:.......

#श्वेता सिन्हा

Wednesday, 12 June 2019

भूटान-यात्रा-1


बचपन से अपने पड़ोसी देश भूटान के संबंध में जब भी कहीं पढ़ा तो यही कि भूटान आर्थिक रूप से एक गरीब देश है पर भूटान की भूमि में प्रवेश करते ही समझ आ गया कि भूटान की भूमि प्राकृतिक रूप से कितनी समृद्ध है। संतुष्ट और खुशियों से भरपूर जीवन की झलक वहाँ देखकर अपने देश के लोग बहुत याद आये न जाने कितनी बार अनायास ही तुलना करने लगे।
मैंने जितना देखा समझा और जाना भूटान की शांति,खूबसूरत पहाड़ और स्वच्छ ऑक्सीजन युक्त हवा जीवन में एक स्वस्थ सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते है।
हमारी यात्रा शुरु हुई टाटानगर रेलवे स्टेशन से
शुक्रवार १७ मई को हावड़ा के लिये। ट्रेन १घंटा १५ मिनट लेट थी।
जमशेदपुर की 40° के तापमान और गर्म हवा के थपेड़ों में भी स्टेशन पर इंतजार करना अच्छा लग रहा था आखिर भूटान यात्रा थी। लेट से आयी ट्रेन में बैठकर हम सब बेहद उत्साहित हो गये थे। हावड़ा उतरकर ,हावड़ा से सियालदाह स्टेशन तक एक प्राइवेट कैब लेकर आये क्योंकि हमारी ट्रेन सियालला से थी, हड़बडी में IIRCTC
के कैंटीन में खाना खाकर चढ़ गये ट्रेन में।
दिनभर की पकाऊ यात्रा से बेहाल ए.सी. कूपे में अपनी सीटों पर बेहद आराम मिला। सब कब सो गये पता भी नहीं चला।
दूसरे दिन यानि १८ मई को ट्रेन में बैठे दौड़ते भागते खूबसूरत दृश्यों को आँखों में भरते करीब 2 बजे अलीपुरद्वार पहुँचे। बहुत सुंदर छोटा सा स्टेशन है।
वहाँ से हमारे ट्रिप संयोजक के द्वारा भेजे गये कार में हम चाय बगान,टोरसा नदी और खूबसूरत जंगल से होते हुये करीब डेढ़ घंटे बाद जलदापाड़ा के रिसोर्ट पहुँचे। सामान रखवाने के लिये तीसरे फ्लोर अपने रुम पहुँचे,दरवाज़ा खुलते आँखें खुली रह गयी तीनों तरफ शीशे के परदे हटे हुये थे और सुपारी के सुंदर करीने से लगे हुये दूर तक फैले पेड़ और चिड़ियों का मधुर कलरव मानो जंगल में किसी पेड़ की शाख पर ठहरे हों हम....अभी सामान रखवा ही रहे थे कि हमें कहा गया खाना खाकर अभी तुरंत निकलना होगा जलदापाड़ा राष्ट्रीय उद्यान देखने। हमलोग सब जल्दी-जल्दी खाकर जैसे थे वैसे ही चल पड़े गाड़ियों पर सवार होकर।
जलदापाड़ा जंगल-भ्रमण काउंटर से टिकट लिया हमने, खुली जीप जैसी गाड़ियों में हम सब को जंगल घुमाया गया।
जलदापाड़ा राष्ट्रीय उद्यान पश्चिम बंगाल के अलीपुरद्वार उप-मंडल के अंतर्गत जलपाईगुड़ी जिले में स्थित है। यह टोरसा नदी के किनारे है।
समुद्रतल से इसकी ऊँचाई लगभग ६१मी. और २६१.५१ किलोमीटर तक फैला है।
१९४१ में वन्य जीवों और वनस्पतियों के संरक्षण के लिए इसे राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया।
प्राकृतिक खूबसूरत समेटे इस जंगल में शाम को घूमने का आनंद सच में अविस्मरणीय रहा।
मोटे-मोटे विशाल दैत्याकार वृक्ष आसमान को समेटने के लिए बाहें फैलाये हुये जाने कबसे प्रतीक्षा कर रहे प्रतीत हो रहे थे। जंगल में झींगुर का.शोर कुछ अलग सा एहसास उत्पन्न करता है। बहुत रहस्यमयी लगता है जंगल।
पालतू हाथियों का झुंड और उनके बदमाश बच्चे, (जब हम जीप खड़ी करके उनखी तस्वीर उतार रहे थे हाथी का एक बहुत प्यारा बच्चा पास आकर हमें डराने की कोशिश कर रहा था  मीठी(मेरी बेटी) तो उछल पड़ी खुशी से...)अनगिनत जंगली भैंसा,खूब सारे मोर,सफेद गैंडा, हिरण और दुर्लभ प्रजाति के पेड़ मंत्रमुग्ध से हम निहारते रहे। जंगल में बीच-बीच में तीन-चार नाले भी दिखाई दिये।
जंगल में एक जगह पार्क सा बना हुआ था हिरण, मोर और जंगली भैंसा आराम से घूमते दिख रहे थे वहाँ हमारे ड्राइवर ने बताया कि
वन-विभाग की ओर से पर्यटकों के लिए आयोजित स्थानीय नृत्य देखने मिलेगा।
सब लोगों को आदरपूर्वक एक बड़े खुले मैदान में लगे बैंचों पर बैठाया गया और फिर करीब दर्जनभर लड़कियाँ पारंपरिक वेशभूषा में नृत्य करने आयीं..एक अन्य औरत और कुछ छोटी बच्चियाँ अत्यंत सुरीले स्वर में लोकगीत गा रही थीं वहीं पास बैठा एक आदमी मांदर जैसा वाद्य बजा रहा था। गीत के ताल पर थिरकते लयबद्ध पैर भावभंगिमा जादू सा माहौल बना रहे थे।
एक-एक कर चार गाने और प्यारी मासूम लड़कियों का थिरकना कब खत्म हुआ पता ही न चला।  कुल मिलाकर सुमधुर गीत-संगीत संध्या ने शाम को यादगार बना दिया।
शाम घिरने लगी थी और आसमान में बादल भी।
हमारे वापस लौटते ₹-लौटते खूब तेज.बारिश हो गयी। एक शेडनुमा दुकान में हमने भागकर पनाह ली। लगभग आधे घंटे बाद बारिश बंद होने पर वापस होटल पहुँचे। गरमागरम चाय और नाश्ता तैयार मिला।
हम सब चाय पीकर आराम करने लगे नौ डिनर के लिए नीचे गये।
हमें दूसरे दिन सुबह नौ बजे ब्रेकफास्ट करके आगे के सफ़र के लिए तैयार रहने को कहा गया।
बढ़िया स्वादिष्ट गरम खाना खाकर हमलोग दिनभर की बातें करते सो गये।
सुबह चिड़ियों की खिड़की के शीशे पर चोंच से दस्तक की आवाज़ से नींद खुली।
मैना की तीन-चार जोड़ी आपस में खेल रहे थे।
सूरज की नरम किरणें सुपारी के पेड़ों के पीछे से
खिलखिलाकर कमरे में दाखिल हुई मानो नींद से जगाने आयी हो हौले से।
हम सब तैयार होकर नाश्ता करके आस-पास यूँ ही टहलने निकल गये। अनानास के पौधे, काजू के पेड़ और कच्चे फल,खजूर के पेड़ तथा और भी अन्य पौधों से बिटिया का परिचय करवाकर,वापस लौटे तो गाड़ियों में सामान रखा जा रहा था।
अब हम आगे की यात्रा यानि "जयगाँव"के लिये गाड़ी में सवार हो रहे रहे थे।....
जयगाँव में भारत से भूटान प्रवेश करने का द्वार है।


#श्वेता सिन्हा
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Friday, 28 December 2018

मुआवज़ा


"अरे बिटिया ज़रा एक गिलास पानी ला दे, दवा खा लूँ फिर निकलूँ काम पर" पार्वती ने बेटी मीरा को धीरे से आवाज़ देकर कहा।

"माँ मत जाओ न काम पर आज, तुम्हारी तबियत ठीक नहीं है, अभी कल ही तो तुम्हारा बुखार उतरा है दो-चार दिन आराम कर लो, मैं फोन कर देती हूँ सोसायटी ऑफिस में , या तुम कहो तो जाकर बोल आती हूँ ,मीरा ने पानी का गिलास माँ की हाथों में थमाते हुये कहा।

ना बिटिया,जाना जरुरी है?  दो दिन बाद सोसायटी का सालाना जलसा है बहुत काम है, कुछ रुपये बोनस के मिलेंगे तो तेरे लिए जरुरी सिलाई की सामग्री आ जायेगी, गैरहाज़िरी की वजह से वैसे भी सप्ताहभर के पैसे नहीं मिलेंगे।

मीरा ने बहुत समझाया पर पार्वती माने तब न।
आखिर हार कर मीरा ने कहा,
" तुम मानोगी नहीं, अच्छा! तुम तैयार हो जाओ मैं अपनी साइकिल से तुम्हें सोसायटी छोड़ते हुये सेंटर चली जाऊँगी।"

पार्वती अपने पति रामनाथ और बेटी मीरा के साथ 
बस्ती में रहती है। रामनाथ सफाई कर्मचारी है एक प्राइवेट अस्पताल में,और पार्वती एक हाऊसिंग सोसायटी में साफ-सफाई का काम करती है।  मीरा सरकारी अनुदान से चलाये जाने वाले एक सेंटर में सिलाई-कढाई सीख कुछ ही दिनों में सर्टिफिकेट मिल जायेगा फिर मीरा अपना सेंटर खोलेगी ऐसा सोचा है उसने।

मीरा पार्वती को सोसायटी गेट पर छोड़ते हुये हिदायत देने लगी,"माँ जाने क्यों आज तुम्हें छोड़कर जाने का मन नहीं हो रहा, सुनो ज्यादा काम मत करना, और काम खत्म करके यही गार्ड अंकल के पास बैठना मैं बस दो घंटे में आकर तुम्हें लेतेे हुये घर जाऊँगी।" मीरा चली गयी

पार्वती धीमे क़दमों से गेट से अंदर दाख़िल हुई।
पिछले सात सालों से वह इस सोसायटी में काम कर रही है। चार विंग्स में करीब 100 फ्लैट्स बने हुये हैं। पहाड़ के नाम पर आधारित चारों विंग्स के नाम। धौलागिरी,नीलगिरी,हिमगिरि और उदयगिरि हैं।
मेन गेट से करीब 100 मी. के बाद  फ्लैट्स की सीढ़ियाँ शुरु होती थी।
पार्वती "नीलगिरी" की साफ-सफाई का काम देखती है। दस तल्ले में तीस फ्लैट्स है सभी आधुनिक सुविधा से युक्त, प्रवेशद्वार में सी.सी.टीवी कैमरे लगे हैं और लिफ्ट लगा है।
आज पार्वती को मेन गेट से नीलगिरी तक आते-आते थकान महसूस होने लगी।
बीमारी की वजह से कमजोरी लग रही है सोचती हुई  लिफ्ट के दरवाजे से चार क़दम दूर सीढि़यों पर बैठ गयी।

"क्या हुआ पार्वती कैसी हो?"

"बड़े दिन बाद दिखाई दी देखो सीढ़ियाँ कितनी गंदी हो गयी हैं।"

"अरे!पार्वती आ गयी तुम? तबियत कैसी है?"

 सीढ़ियों से इक्का-दुक्का नीचे आ रहे और ऊपर जा रहे सोसायटी के लोग औपचारिकता से हाल समाचार पूछ रहे थे।
पार्वती भी हल्का-सा मुस्कुरा कर सिर हिला कर जवाब दे रही थी।

सीढ़ियाँ चढ़ने में साँस फूलने लगती है उतरने में ज्यादा कठिनाई नहीं होती आज लिफ्ट से ही चलती हूँ दस मिनट सुस्ताकर पार्वती सोचती हुई उठी। 

आज लिफ्ट खाली पड़ी है!जाने क्यों ! चलो अच्छा है ,उसे असहज नहीं लगेगा। एक बार मेमसाहब और साहब लोगों के साथ लिफ्ट में सवार हुई थी पर उनकी हिकारत भरी दृष्टि से अपने में सकुचा गयी थी।
बिना कुछ बोले ही उसे जता दिया गया कि उसको 
उन सबके साथ लिफ्ट में सवार नहीं होना चाहिये था।
 तभी से उसने निर्णय लिया था कि कभी अब लिफ्ट से नहीं जायेगी पर आज सीढ़ी चढ़ने की हिम्मत नहीं।
थोड़ी देर असमंजस में खड़ी रही धड़कते दिल से लिफ्ट का बटन दबाया उसने, थोड़ा रुक-रूक कर लिफ्ट का दरवाज़ा खुला जैसे जाम हो और वह दाखिल हो गयी, दसवें माले का बटन दबाकर साँस रोके खड़े गयी। दसवें माले पर लिफ्ट रुका तो बाहर निकलने के लिए उसने एक पैर बाहर निकाला ही था कि अचानक लिफ्ट का दरवाज़ा बंद हो गया और लिफ्ट चल पड़ी..पलभर में मार्मिक चीख से पूरा अपार्टमेंट दहल गया।  पार्वती का शरीर लिफ्ट में टुकड़ों में बँटा लहुलुहान पड़ा था।
हृदयविदारक चीख सुनकर आस-पास के लोग दौड़  गये।  कुछ ही पल में भीड़ इकट्ठी हो गयी, आनन-फानन पुलिस भी आ गयी।  रक्तरंजित लिफ्ट से पार्वती का शव बाहर निकाला गया।
  
सोसायटी के सेक्रेटरी और अन्य लोग हैरान-परेशान खुसुर-फुसुर कर रहे थे।
पुलिसिया पूछ-ताछ और छान-बीन और सभ्य लोगों के बयान में यह स्पष्ट हो गया कि लिफ्ट में कुछ दिनों से कोई तकनीकी खराबी आ गयी थी इसलिए कोई इसका इस्तेमाल नहीं कर रहा था। लिफ्ट के दरवाजें के पास अंग्रेजी में लिखा हुआ  एक नोटिस भी चिपका हुआ था। 
सारी कानूनी प्रक्रिया पूरी कर ली गयी।
अब तक पार्वती के समाज के लोग और अन्य सामाजिक संगठन तथा राजनीतिक पार्टियों के कार्यकर्ता जुट गये थे। सब तरह-तरह के मुआवजे की माँग कर रहे थे। धरना-प्रदर्शन और अन्य हंगामे लफड़ों से बचने के लिए सोसायटी के सेक्रेटरी ने अन्य सदस्यों से सलाह-मशविरा करके बड़ी मुश्किल से दो लाख रुपये का चेक दो दिन बाद देना स्वीकार किया।
  सभी तरह की कारवाई और पोस्टमार्टम वगैरह के बाद शव का अंतिम संस्कार कर दिया गया।
 बस्ती के लोग जो संवेदना प्रकट करने पार्वती के घर आ रहे थे सबकी उत्सुकता मुआवज़े की रक़म को लेकर थी। किसी भी संगठन से कोई मिलने आता एक बार मुआवज़े की राशि का ज़िक्र जरुर करता सभी लोग यह बताने में लगे थे कि मुआवज़ा 
 उनके प्रयासों से मिल रहा है। 
  शोक में डूबी मीरा और उसके पिता को दो दिन बाद सोसायटी बुलवाया गया । सालाना जलसा का खूब भव्य आयोजन था,दुल्हन की तरह सजी सोसायटी,तरह-तरह के स्वादिष्ट व्यंजनों की सुगंध फैली थी। चमकीले बिजली के झालर,रंग-बिरंगे शामियाने,कृत्रिम फव्वारे और भी अन्य तरह की सजावट थी। शायद कोई प्रसिद्ध कलाकार आने वाला था।
तय समय में मीरा और उसके पिता पहुँचे, सोसायटी हॉल में सफेद चादर लगाकर एक शोक सभा का आयोजन किया गया था जिसमें स्थानीय पत्रकार,राजनीतिक दल के प्रतिनिधि ,विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि और सोसायटी के सदस्य थे।
पर यह शोक-सभा तो किसी भी तरह नहीं लग रहा था, हँसी-मज़ाक से भरपूर माहौल में सकुचायी-सी मीरा और रामनाथ उदास ,अनमने ख़ुद में सिमटे हुये थे।
पार्वती के लिए औपचारिक दो मिनट का मौन और औपचारिक भाषण के पश्चात जब मीरा और रामनाथ को बुलाकर दो लाख के मुआवजे का चेक थमाया गया तो मीरा ने रूंधे गले से कहा-
"इन पैसों से मेरी माँ अब वापस नहीं आ सकेगी , मुझे मुआवज़ा नहीं चाहिये, मेरी विनम्र विनती है सेक्रेटरी जी से कि इन पैसों का उपयोग खराब लिफ्ट को बनवाने में किया जाय ताकि कोई और पार्वती ऐसी दुर्घटना का शिकार न हो।"

-श्वेता सिन्हा

Thursday, 29 November 2018

चोर


सुबह के साढ़े आठ बज रहे थे, मैं घर के कामों में व्यस्त थी।

  चोर! चोर!

 शोर सुनकर मैं बेडरूम की खिड़की से झाँककर देखने लगी। एक लड़का तेजी से दौड़ता हुआ गली में दाखिल हुआ उसके पीछे तीन लोग थे उनमें से एक मंदिर का पुजारी था, सब दौड़ते हुये चिल्ला रहे थे,
 "पकड़ो,पकड़ो चोर है काली माँ का टिकुली(बिंदी) चुराकर भाग रहा है।"

फिर उस चोर लड़के के पीछे भागने वाले में एक ने चोर को दबोच लिया। तब तक कुछ और लोग जुट गये लप्पड़-थप्पड़ ,फैट, घूँसे, माँ-बहन गालियों से जमकर उसकी ख़ातिर करने लगे।

करीब 12-13 साल का होगा वह लड़का,ढंग की बुशर्ट फुलपैंट,साफ-सुथरा रंग, अच्छा सा स्वेटर भी पहन रखा। पहली नज़र में देखने पर किसी सभ्रांत घर का दिखने वाला वह लड़का, भीड़ के रहमो-करम से सहमा हुआ बार-बार आँख पोंछ रहा था और भीड़ में कोई न कोई उसे रह-रहकर "चोर कहीं का" कहकर थप्पड़ जमाये जा रहा था। उस के मुँह से खून बह रहा था,बहुत सहमा हुआ था लड़का।

तभी भीड़ में से किसी ने कहा,"अरे भाई सब काहे मार रहे हो? पुलिस के हवाले कर दो, उसके आगे के शब्द उस व्यक्ति के मुँह में ही रह गया एक जोरदार थप्पड़ उसके गाल पर पड़ा, मुहल्ले के एक रोबदार ठेकेदार ने भद्दी सी गाली देकर कहा, "चुप,ज्यादा हिमायती बन रहा चोर का , कहीं तुम इसके साथी तो नहीं!!
बेचारा गरीब चुपचाप मुँह झुकाये अपनी राह आगे बढ़ गया।

लोग अभी पूछताछ कर रहे थे कि तब तक पुलिस भी आ गयी, पुलिस के सामने सब गोल बनाकर खड़े हो गये और पुलिस उस लड़के से पूछने लगी,
 लड़के के मुँह से बमुश्किल आवाज़ निकल रही थी, आँसू पोंछ-पोंछकर, हाथ जोड़कर सहम-सहमकर टूटी-फूटी आवाज़ में कहने की कोशिश कर रहा था, मेरे पास नहीं है टिकुली , दौड़ने में गिर गया।
"ऐ ,ज्यादा नाटक मत कर बता तेरे गिरोह में कौन-कौन है?
 और क्या-क्या चोरी किया है?" 
पुलिस वाला कह रहा था तेरी इतनी हिम्मत कि दिन-दहाड़े चोरी कर रहा।"

 किसी को इस बात से कोई सरोकार नहीं था कि वह लड़का कुछ और भी कहना चाह रहा था, बार-बार माँ..माँ कहकर कुछ बताना चाह रहा था,पर भीड़ को किसी चोर की किसी बात से क्या लेना-देना, सब उसके कर्म का हिसाब करने में लगे थे। साथ ही सज़ा की घोषणा भी कर रहे थे , भीड़ के कुछ लोग अपने घर में हुये चोरी के संस्मरण सुनाने लगे।
तब तक मुहल्ले का सबसे नामचीन आदमी भी पहुँच गया, सब उससे डरते हैं, किसी की मज़ाल जो चूँ भी कर सके इसके आगे, रसूख़दार,मार-पीट में आगे,दो नं. के धंधे में सबसे आगे, रंगदारी वसूलना उनके बाँयें हाथ का काम है,एक बड़े नेता का आशीष भी है जिससे सोने पर सुहागा वाला कहावत पूरी तरह चरितार्थ होती है, पुलिसवालों के यहाँ सुबह-शाम की चाय होती है। उस दबंग ने आते ही सबसे पहले उस लड़के का कॉलर खींचकर कस कर चार थप्पड़ लगा दिया फिर बोला, "साला चोर कहीं का, इसी सब की वजह से समाज गंदा हो गया है।"

उसकी बात सुनकर मुझे बहुत हँसी आ रही थी, मेरी दादी अक्सर जो कहावत कहती थी मेरे होंठ बुदबुदा उठे।

"चलनी दूसे सुप्पा के जेकर में खुदे बहत्तर गो छेद"

(अर्थात् दूसरे के अवगुण ढ़ूँढने वाले काश कि कभी तुम अपने चरित्र का अवलोकन कर पाते)

 "बाद में मालूम हुआ वह लड़का अपनी माँ के साथ बस्ती में रहता है , पिता के मरने के बाद सभी रिश्तेदारों ने किनारा कर लिया है, माँ काम करके उसकी हर जरुरत पूरी करती रही, अचानक जाने क्या हुआ , माँ गंभीर रुप से बीमार पड़ गयी, सप्ताह भर से उसकी माँ किसी अस्पताल में बेहोश पड़ी है, छठी कक्षा में पढ़ने वाले उस लड़के को अस्पताल के किसी कर्मचारी ने कहा कि अगर वह एक लाख रुपया लाकर जमा देगा तो उसकी माँ ठीक हो जायेगी। लड़का बहुत परेशान था, सुबह मंदिर आया तो काली माँ की मूर्ति के माथे की टिकुली देखकर सोचा कि अगर वह इसे बेच देगा तो उसे शायद लाख रुपया मिल जायेगा।"


-श्वेता सिन्हा



प्रेमचंद... एक पत्र

मेरे प्रिय लेखक प्रेमचंद जी, यूँ तो आपसे मेरा प्रथम परिचय आपकी लिखी कहानी  'बड़े घर की बेटी' से हुआ। हाँ हाँ जानती हूँ आ...