Thursday, 29 November 2018

चोर


सुबह के साढ़े आठ बज रहे थे, मैं घर के कामों में व्यस्त थी।

  चोर! चोर!

 शोर सुनकर मैं बेडरूम की खिड़की से झाँककर देखने लगी। एक लड़का तेजी से दौड़ता हुआ गली में दाखिल हुआ उसके पीछे तीन लोग थे उनमें से एक मंदिर का पुजारी था, सब दौड़ते हुये चिल्ला रहे थे,
 "पकड़ो,पकड़ो चोर है काली माँ का टिकुली(बिंदी) चुराकर भाग रहा है।"

फिर उस चोर लड़के के पीछे भागने वाले में एक ने चोर को दबोच लिया। तब तक कुछ और लोग जुट गये लप्पड़-थप्पड़ ,फैट, घूँसे, माँ-बहन गालियों से जमकर उसकी ख़ातिर करने लगे।

करीब 12-13 साल का होगा वह लड़का,ढंग की बुशर्ट फुलपैंट,साफ-सुथरा रंग, अच्छा सा स्वेटर भी पहन रखा। पहली नज़र में देखने पर किसी सभ्रांत घर का दिखने वाला वह लड़का, भीड़ के रहमो-करम से सहमा हुआ बार-बार आँख पोंछ रहा था और भीड़ में कोई न कोई उसे रह-रहकर "चोर कहीं का" कहकर थप्पड़ जमाये जा रहा था। उस के मुँह से खून बह रहा था,बहुत सहमा हुआ था लड़का।

तभी भीड़ में से किसी ने कहा,"अरे भाई सब काहे मार रहे हो? पुलिस के हवाले कर दो, उसके आगे के शब्द उस व्यक्ति के मुँह में ही रह गया एक जोरदार थप्पड़ उसके गाल पर पड़ा, मुहल्ले के एक रोबदार ठेकेदार ने भद्दी सी गाली देकर कहा, "चुप,ज्यादा हिमायती बन रहा चोर का , कहीं तुम इसके साथी तो नहीं!!
बेचारा गरीब चुपचाप मुँह झुकाये अपनी राह आगे बढ़ गया।

लोग अभी पूछताछ कर रहे थे कि तब तक पुलिस भी आ गयी, पुलिस के सामने सब गोल बनाकर खड़े हो गये और पुलिस उस लड़के से पूछने लगी,
 लड़के के मुँह से बमुश्किल आवाज़ निकल रही थी, आँसू पोंछ-पोंछकर, हाथ जोड़कर सहम-सहमकर टूटी-फूटी आवाज़ में कहने की कोशिश कर रहा था, मेरे पास नहीं है टिकुली , दौड़ने में गिर गया।
"ऐ ,ज्यादा नाटक मत कर बता तेरे गिरोह में कौन-कौन है?
 और क्या-क्या चोरी किया है?" 
पुलिस वाला कह रहा था तेरी इतनी हिम्मत कि दिन-दहाड़े चोरी कर रहा।"

 किसी को इस बात से कोई सरोकार नहीं था कि वह लड़का कुछ और भी कहना चाह रहा था, बार-बार माँ..माँ कहकर कुछ बताना चाह रहा था,पर भीड़ को किसी चोर की किसी बात से क्या लेना-देना, सब उसके कर्म का हिसाब करने में लगे थे। साथ ही सज़ा की घोषणा भी कर रहे थे , भीड़ के कुछ लोग अपने घर में हुये चोरी के संस्मरण सुनाने लगे।
तब तक मुहल्ले का सबसे नामचीन आदमी भी पहुँच गया, सब उससे डरते हैं, किसी की मज़ाल जो चूँ भी कर सके इसके आगे, रसूख़दार,मार-पीट में आगे,दो नं. के धंधे में सबसे आगे, रंगदारी वसूलना उनके बाँयें हाथ का काम है,एक बड़े नेता का आशीष भी है जिससे सोने पर सुहागा वाला कहावत पूरी तरह चरितार्थ होती है, पुलिसवालों के यहाँ सुबह-शाम की चाय होती है। उस दबंग ने आते ही सबसे पहले उस लड़के का कॉलर खींचकर कस कर चार थप्पड़ लगा दिया फिर बोला, "साला चोर कहीं का, इसी सब की वजह से समाज गंदा हो गया है।"

उसकी बात सुनकर मुझे बहुत हँसी आ रही थी, मेरी दादी अक्सर जो कहावत कहती थी मेरे होंठ बुदबुदा उठे।

"चलनी दूसे सुप्पा के जेकर में खुदे बहत्तर गो छेद"

(अर्थात् दूसरे के अवगुण ढ़ूँढने वाले काश कि कभी तुम अपने चरित्र का अवलोकन कर पाते)

 "बाद में मालूम हुआ वह लड़का अपनी माँ के साथ बस्ती में रहता है , पिता के मरने के बाद सभी रिश्तेदारों ने किनारा कर लिया है, माँ काम करके उसकी हर जरुरत पूरी करती रही, अचानक जाने क्या हुआ , माँ गंभीर रुप से बीमार पड़ गयी, सप्ताह भर से उसकी माँ किसी अस्पताल में बेहोश पड़ी है, छठी कक्षा में पढ़ने वाले उस लड़के को अस्पताल के किसी कर्मचारी ने कहा कि अगर वह एक लाख रुपया लाकर जमा देगा तो उसकी माँ ठीक हो जायेगी। लड़का बहुत परेशान था, सुबह मंदिर आया तो काली माँ की मूर्ति के माथे की टिकुली देखकर सोचा कि अगर वह इसे बेच देगा तो उसे शायद लाख रुपया मिल जायेगा।"


-श्वेता सिन्हा



Thursday, 22 November 2018

केक


"आज केक आयेगा"

"आज केक आयेगा।"

केक आयेगा न पापा? मेरे चेहरे पर मासूम आँखें टिकाकर तनु ने पूछा।

मैंने मुस्कुराकर हामी भरी तो उसकी आँखों में अनगिनत दीप जल उठे।

सात वर्षीय बिटिया तनु खुशी से नाच रही थी पूरे घर में, आज उसका जन्मदिन है। 
आज के दिन के लिए खास उसने तीन महीने पहले से ही मुझसे कह रखा था उसे भी अपने जन्मदिन पर नयी फ्रॉक पहनकर केक काटना है,रंगीन मोमबत्तियाँ फूँक मारकर बुझानी है फिर पापा और मम्मा बर्थडे सॉग गायेंगे। फिर वह टेस्टी वाला केक खायेगी। सबसे पहले पापा को फिर मम्मा को खिलायेगी केक पर क्रीम का जो फूल होता है न उसको और कोई नहीं खायेगा बस वही खायेंगी,उसकी मासूम बातें मुस्कुराने को मजबूर कर देती है।

इस दो कमरे के किराये के मकान में मैं,मेरी पत्नी और मेरी बिटिया अभावों में भी खुश रहने का हरसंभव प्रयास करते हुये जी रहे हैं।
मैं एक मामूली चपरासी था एक छोटे से ऑफिस में।
मामूली तनख्वाह में किसी तरह खींच-तान कर गुजर हो जाती है। पर केक जैसी मँहगी चीजें खरीदने के लिए सोचना पड़ता है। पिछले महीने पत्नी को डेंगु हो गया था तो बचत के रुपये उसमें खर्च हो गये थे।
इस महीने बड़ी मुश्किल से कतर-ब्योंत करके हमने कुछ बचत की है जिससे कोई बड़ी दावत तो नहीं पर हाँ उसकी बढ़िया वाला केक की फरमाइश जरुर पूरी हो सकती थी। सुबह से ही  तनु उसकी माँ को हर दस मिनट में याद दिला रही थी कि किस टेबल पर केक रखना है, सबसे सुंदर नारंगी फूलों वाला टेबल क्लाथ बिछाना है, मैं मोमबत्तियाँ कहीं भूल न जाऊँ इसलिए पहले ही खरीदा जा चुका है,केक काटने के लिए स्टील का नया चाकू उस बाँधने के लिए लाल रिबन और भी न जाने क्या-क्या अब बस केक आना बाकी है जो शाम को लौटते समय मैं लेता आऊँगा। मैं शाम सात बजे केक लेकर आने की बात करके ऑफिस आ गया।
निर्धारित समय पर ऑफिस से निकला, नवंबर महीने का पहला सप्ताह था पाँच बजे से ही अंधेरा घिरने लगता है अभी पौने छः बजे रहे थे। 
सोचने लगा चलो ठीक है समय पर पहुँच जाऊँगा।
मन ही मन केक का हिसाब-किताब करता हुआ जल्दी-जल्दी क़दम बढ़ाता, अपने शहर के नामी बेकरी दुकान पर आकर ठिठक गया। 
महँगे कपड़े पहने संभ्रात घरों के खिलखिलाते बच्चों और आनंदित होते अभिभावकों को देखकर कुछ सकुचा-सा गया अनायास मेरे हाथ यूनीफॉर्म को सहलाने लगे।
फिर जेब में पड़े रुपयों के आत्मविश्वास से भरकर मन ही मन मुस्कुराते हुये मैं शीशे का पारदर्शी दरवाज़ा खोलकर अंदर दाखिल हुआ।
तरह-तरह के लुभावने,मोहक,खुशबूदार केक ,पेस्ट्री और भी न जाने क्या-क्या शीशे के शो केस में करीने से सजे थे, सब पर मूल्य का टैग अंकित था।
मूल्य देखकर ए.सी दुकान में पसीने से भींग गया मैं,

सोचने लगा , बाप रे!मेरे पूरे महीने की तनख्वाह इतनी नहीं जितने का केक है यहाँ। 

तभी कोने में रखे छोटे-से गुलाबी रंग के केक पर अंकित मूल्य देखकर जान में जान आई। 
उसे पैक करवाकर दुकान के बाहर आ गया।  जेब हल्का होने की उदासी छाने लगी पर बिटिया का मुस्कुराता चेहरा याद आते ही सारे ख्याल झटक कर उत्साह में लंबे-लंबे क़दम बढ़ाने लगा।  बाज़ार के मुख्य सड़क से बायीं ओर जाने वाली गली के अंतिम छोर पर चाट के ठेले पर खूब भीड़ लगी थी।  मेरी श्रीमती जी को भी चाट बहुत पसंद है अच्छा अगले महीने उसके लिये ले जाकर खुश कर दूँगा,बेचारी कुछ फरमाइश कहती नहीं कभी।
सोचते-सोचते गली में मुड़ा ही था कि अनायास क़दम ठिठक गये। गली के मुहाने पर लगे लैपपोस्ट से आती हुई हल्की पीली रोशनी का मद्धिम प्रकाश पसरा हुआ था। वहीं कोने में पड़े जूठे पत्तों की ढेर में एक छोटा-सा लड़का जाने क्या ढूँढ रहा था। मैं फीकी रोशनी में आँख गड़ाकर ध्यान से देखने लगा। छः-सात साल उम्र होगी उसकी,फटकर झूलती शर्ट और अजीब तरीके से बाँधकर पहने गये निकर को बार-बार ऊपर खींचता हुआ वह जूठे दोनों से तन्मयता से जूठन चुनकर एक प्लास्टिक की थैली में डालता जा रहा था और बीच-बीच में कुछ मुँह में डाल भी रहा था। 
जड़वत हो गया मैं कुछ पल के लिए। सब भूल गया बिटिया इंतजार कर रही होगी यह भी याद न रहा।
बगल से गुज़र रही बाईक की आवाज़ से तंद्रा भंग हुई मेरी और फिर मन कठोर कर अनदेखा करके आगे बढ़ गया। पर फिर रहा न गया वापस लौट आया और सीधे जाकर उसके पीठ पर खड़ा होकर
उसे आवाज़ दी।

"ऐ बाबू सुनो ज़रा"
वो लड़का अचकचा गया सहमा-सा मेरी तरफ पलटा। उसके चेहरे के भाव अंधेरे में खास समझ नहीं आ रहे थे पर उसकी पनीली आँखों में भरी दीनता से मन भर आया। सूखी पपड़ीदार होंठ पर जीभ फेरता हुआ प्रश्नवाचक दृष्टि से मुझे देखने लगा।
सुनो, यह जूठा मत खाओ तुम। बीमार पड़ जाओगे,
मैंने कहा।
उसने भीगी आवाज़ में अटकते हुये कहा,
"बहुत भूख लगी है।"

मुझे तत्काल कुछ न सूझा। उससे कुछ पूछा भी न गया।
धीरे से केक का पैकेट उसकी ओर बढ़ाते हुये कहा, "तुम इसे खा लो।"

खुशी और असमंजस के मिले-जुले भाव उसकी आँखों में लहराने लगे। वह प्लास्टिक की जूठन वाली थैली किनारे फेंककर केक के पैकेट खोलने में व्यस्त हो गया और मैं चुपचाप पलटकर वापस घर के रास्ते पर चल पड़ा सोचता हुआ कि बिटिया को क्या कहूँगा।

-श्वेता सिन्हा

Monday, 19 November 2018

देव प्रबोधिनी एकादशी



कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवोत्थान या प्रबोधिनी एकादशी कहा जाता है । इन दोनों शब्दों से स्पष्ट है कि किसी भी व्यक्ति के खुद के हाथ में है कि वह अपने भीतर के 'देवत्व' को जागृत कर सकता है क्योंकि प्रबोधन शब्द का आशय ही जागना, यथार्थ ज्ञान और पूर्ण बोध होने से है।  जीवन में हर पल ज्ञान हासिल किया जा सकता है क्योंकि ज्ञान अनन्त है । ज्ञान को ही  भगवान माना गया है । जीवन के बारे में ज्ञान होते ही काम, क्रोध, मद, लोभ, ईर्ष्या-द्वेष आदि अंधकार से मुक्ति मिलती है और जीवन भगवान विष्णु के वैकुंठ या सत्यलोक जैसा आह्लादकारी हो जाता है ।
इसी दिन तुलसी से भगवान विष्णु का विवाह होता है । इस ब्रह्मांड में भगवान सूर्य को विष्णु का रूप माना जाता है । श्रीमद्भगवत गीता में नारायण अवतार कृष्ण ने कहा भी है कि मैं ही सूर्य हूँ । सभी जानते हैं कि सूर्य की किरणों से ऊर्जा मिलती है । आयुर्वेद के अनुसार तुलसी के पौधे से भी ऊर्जा-तरंगे निकलती हैं । तुलसी के पेड़ की परिधि के दो सौ मीटर तक जीवनदायिनी ऊर्जा तरंगें निकलती है । आध्यात्मिक ग्रन्थों में कहा गया है कि जहां तुलसी के पेड़ होते हैं, वहां आकाशीय बिजली नहीं गिरती है । वह परावर्तित हो जाती हैं । इस तरह सूर्य की किरणों तथा धरती पर स्थित किरणों में आपसी सामंजस्य विवाह-बंधन जैसा है ।
 
प्राचीन काल मे विवाह का स्वरूप बड़ा विकृत हुआ करता था । ताकत के बल पर किसी नारी को बलपूर्वक अपनी पत्नी बना लेने की प्रथा थी । पुराणों में जलन्धर, शंखासुर, शंखचूड़ नामक दैत्यों की कथा है कि इन सबने ने तुलसी को बलपूर्वक पत्नी बना लिया था । उस काल में पत्नी का दायित्व होता था कि वह एक पति के प्रति पूर्ण समर्पित रहे । तुलसी के पूर्व पति का नाम जलन्धर था । वृन्दा के सतीत्व से जलन्धर महाबली हो गया । बल की प्रवृत्ति है कि वह ज्ञान का अपहरण कर लेता है और अहंकार को जन्म देता है । भगवान विष्णु का जलन्धर का रूप धारण करना 'शठ के साथ शठता' का उदाहरण तथा नारी के सम्मान का सूचक है । वृन्दा के शाप तथा पत्नी होने की कथा से स्पष्ट है कि वह यह सन्देश दे रही है कि व्यक्ति कभी भी जलन्धर का रूप न धारण करे तथा नारी-सम्मान पर आघात न पहुंचाए । इस प्रकार का आश्वासन मिलते ही तुलसी का शालग्राम के रूप में विष्णुजी से विवाह हुआ । शालग्राम एक विशेष प्रकार का पत्थर है जो हिमालय और गंडकी नदी में पाया जाता है। पत्थर होने का निहतार्थ नारी के प्रति चंचल भाव त्याग कर दृढता से लेना ज्यादा उपयुक्त है । 'प्रबोध' शब्द का अर्थ 'आश्वासन' भी होता है । अन्य दैत्यों की भी कथा इसी तरह की है । कार्तिक महीना दान का महीना है । ग्रीष्म ऋतु में प्रकृति का रूप बिगड़ जाता है । आकाशमण्डल में स्थित सूर्य का रूप बड़ा कठोर हो जाता है । पृथ्वी की हरीतिमा, जल को अवशोषण हो जाता है । लेकिन जब भगवान विष्णु के योगनिद्रा से उठने का समय आता है तो प्रकृति में अनुकूलता आने लगती है । आकाश से खुशहाली का दान होने लगता है । अंतरिक्ष के इस दानी स्वरूप के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए इसे एक महापर्व बनाया गया । इस एकादशी तिथि से विवाहादि शुभ कर्म और अनुष्ठान शुरू हो जाते हैं । इस तरह कार्तिक एकादशी अध्यात्म के साथ वैज्ञानिक तथा सामाजिक सरोकारों को जानने का भी पर्व है ।

साभार
संकलित

Monday, 12 November 2018

छठः संस्मरण


भोर चार बजे नींद खुली तो दूर किसी लाउडस्पीकर पर बजते पवित्र पावन सुमधुर शारदा सिन्हा के  गीतों ने के आकर्षक में बंधी हुई बालकनी का दरवाज़ा खोलकर खड़ी हो गयी ताकि और अच्छे से गाने के बोल सुन सकूँ।  ठंड बढ़ गयी है, भोर में वैसे भी थोड़ी ज्यादा ही सिहरन होती है गीत समाप्त होते ही एहसास हुआ। पर फिर भी मन नहीं हुआ भीतर आने का वही कोने में चेयर खींचकर बैठ गयी। दूर टिमटिमाती रंगीन बल्ब की झालरों और छठ के गीतों का मिश्रण मुझे अतीत में खींच कर ले गये।

"अरे बचुआ सब तोहनी के सौ बार बोललियो समझे न आवहे कुछो न बुझाहे दूर रह स एई जा से।"
बड़की मामी भोर से बड़बड़ाना शुरु कर देती चित्रगुप्त पूजा के दूसरे दिन सुबह गेहूँ सुखाना होता था।
पूरा घर बच्चों से भरा रहता था मामी के साथ-साथ हम सब जगकर तैयार धमा-चौकड़ी के लिए।
हम सब की खीं-खीं से पूरा घर जग जाता।
बड़े से मिट्टी के आँगन को लीपने के लिए गोबर लाने की जिम्मेदारी बच्चों की होती थी, आधे घंटे मे ही गोहाल से लाकर गोबर का ढेर लगा देते। बड़ी दीदियाँ आँगन लीपती माँ और मौसी नदी से कलशा,गगरी और बटलोही में भरकर पानी लाती।
खटिया धुलाता और बड़का मामा की धुली धोती बिछायी जाती । बाँस की टोकरी में गेहूँ धोकर खटिया पर सुखाया जाता । मधुर गीतों से पूरा घर-मुहल्ला गूँजता रहता।  हम बच्चे नदी के घाट पर अपना जगह छेकने जाते थे और ज्यादा जगह के लिए झगड़ा भी खूब करते थे नदी के पत्थरों से घेरे गये उस जगह के बीच चादर ,दरी बिछाकर ऐसा लगता जैसे हम मालिक हो गये है वहाँ के।
नहाय-खाय के दिन मामी को सोने कहाँ देते थे हमलोग, सब सर पर खड़े हो जाते थे कौआ बोलने के पहले ही मामी उठिये न आप भूल गयी आज लौकी भात बनाना है। हा हा हा..
मामी के नहाने के पहले ही पूरी बानर सेना नहा- धोकर तैयार हो जाती थी।
पूरी पवित्रता से अरवा चावल चना का दाल और लौकी की सब्जी बनाती खरल में कूट के डाले गये मसाले,सेंधा नमक और घी के छौंक से घर सुवासित हो जाता था। प्रसाद बनाने के बाद मामी भोग लगाती फिर हम बच्चों को आँगन में पगंत बैठती और जमकर सब खाते। वैसा स्वाद शायद ही किसी पकवान का रहा होगा।
खरना के दिन तो हमारा भाव बढ़ा रहा मामा दूध लाकर रख देते थे  आम की लकड़ियों का ढेर चुटकियों में हमलोग काट कूट के बराबर कर देते।
माँ ,मामी,मौसी मिसराइन चाची सब मिलकर जाता(हाथ की चक्की)में गेंहूँ पीसती और हम सब दौड़-दौड़कर आस-पास के मुहल्लों में निमंत्रण दे आते आज शाम को प्रसाद खाने आइयेगा।
गुड़ की खीर पूरी और चिनिया केला का भोग लगाया जाता।
शाम को मामी के पूजा करने के बाद कौन सबसे पहले पियर सेंनुर लगवायेगा इसकी होड़ रहती।
माँ को मामी और मुहल्ले की तमाम औरतों को नाक पर से सेंनुर लगाये देखकर एक बार तो हम भी रठान मार दिये हमको भी लगाना है तब माँ समझायी कि नाक पर से सेंनुर ब्याहाता औरतें लगवाती हैं।
साँझ के अरग वाले दिन मुँह अंधेरे  ही पूजा घर धो-पोंछकर तैयार हो जाता। मामा भैय्या सब लोग हाट से लाये सूप, दौरा और फल के बड़े से ढेर को धोते। ऐसे फल जो सिर्फ छठ में ही देखने को मिलते हम बच्चों के लिए मनोरंजन का साधन होता सब कौतूहल से पूछते ये क्या है वो क्या है.?और मामी की मीठी झिड़की चलती रहती "दूर रह तू सब जा घाट देख आओ"
कुछ मत छू रे भाग यहाँ से हे,सूरज भगवान इनका सब के माफ करी,कुछो छू छा न कर तोहनी सन।"
फिर शुरु होता मुख्य प्रसाद बनाने का सिलसिला
बड़े से परात में आटा गुड़ और घी का मोयन सौंफ,नारियल की गरी आदि डालकर मिश्रण बनाया जात फिर नयी ईंट जोड़कर आम की लकड़ी सुलगाकर बड़ी सी पीतल की कढ़ाई में खूब सारा घी डालकर धीमी आँच पर ठेकुआ बनाया जाता।
पूरे घर में फैली भीनी खुशबू इसे पगलाये हम सब सौ चक्कर लगा आते।
फिर शुरु होता था सजने-सँवरने का सिलसिला,
चटख रंग के कपड़े पहनते, 'ध्यान रहे कोई काला मत पहनना तीज त्योहार पर ऐसा अशुभ रंग कोई पहनता है मासी कहती' इत्र,तेल-फुलेल लगाकर काजल बिंदी करके सब खुद पर मुग्ध होते रहते।
सब भाइयों के कमर पर पॉकेट चुटपुटिया पटाखों चॉकलेट बम,सुतली बम,काली बम,त्रिपल साउंड आदि से भरे रहते। दीपावली का छिपाया स्टॉक निकल जाता। सब लोग चप्पल-जूते घर पर उतार कर रख देते भैय्या मामा सबके माथे दौरा सूप पीले कपड़े में बाँधकर रखा जाता। और छठ गीत में मंगल कामना गाते सूरूज देव को मनाते निहोरा करते सब बड़े उत्साह से घाट पर जाते।
रंग-बिरंगे परिधानों मेंं सजे लोग एक-दूसरे के सहयोग करने को तत्पर प्रेम और सौहार्द का ऐसा मंज़र कहाँ देखने मिला फिर।
पता ही न चलता किसके घर छठ हो रहा और किसके घर नहीं। सब एक रंग में रंगे दिखते भक्ति के रंग में।
साँझ अरग के बाद घाट से वापसी के समय सब बच्चे गोलगप्पे और चाट के ठेले पर मौज मनाते।
मामा-मौसा और भैय्या की तरफ से जमकर पार्टी होती थी। उसके बाद रात का खाना कोई नहीं खाता था।
रातभर मामा मौसी माँ और आस-पास की कुछ औरतें मिलकर प्रसाद बनाती हम सब बच्चे उत्साह में रातभर जगते और घाट जाने के समय उनींदे हो जाते आखिर बच्चे ही थे।
जैसे-तैसे उठाकर मनाकर लादकर सबको घाट लाया जाता। फिर सूरूज देव के जगने तक खूब गीत गाये जाते अंधकार में डूबी नदी के किनारोंं पर जब पत्तों पर दीये रखकर जलाये जाते ऐसा लगता आसमां के नन्हें सितारे जमीं पर उतर आये हैं। पौ पटते के साथ ही एक नवीन ऊर्जा का संचरण हो जाता, तबतक बच्चे भी जग जाते। आसमां पर आँखें टिकाये भोर की ठंडी हवा में सिहरते कुनमुनाते सूर्य की लाली छाते ही सब चिल्ला पड़ते।
अरग के बाद प्रसाद के लिए पगलाये रहते थे सब।
मामी एक-एक बच्चे को याद से ठेकुआ देती और टीका लगाती।
फिर बच्चे निकल पड़ते चुपचाप आसपास सबसे प्रसाद माँगने कोई बड़ा कितना भी कुछ कहे हम कहाँ सुनते थे पूरा घाट घूम-घूमकर ठेकुआ केला का ढेर जमा करते थे।
उस दिन खाना कौन खाता आधा दिन इधर उधर चरते ही बीत जाता। फिर थक हार सब मुँह खोले जिसको जहाँ जगह मिला घुस के सो जाते।
बचपन का वो दौर वो छठ फिर कभी न आया।

सूर्य की लाली आसमान से उतर कर बालकनी में फैल गयी थी। उदास होठों पर आई यादों की मीठी मुस्कान को सहेजकर दैनिक कार्य में जुट गयी हूँ पर दिमाग मन उन गलियों से निकल ही पा रहा।
शायद बदलते दौर में ऐसी बेशकीमती यादें ही हमारी बेशकीमती पूँजी हैं।
©श्वेता सिन्हा


Sunday, 11 November 2018

छठ: आस्था का पावन त्योहार

धरा के जीवन सूर्य और प्रकृति के उपासना का सबसे बड़ा  उत्सव छठ पर्व के रूप में मनाया जाता है।बिहार झारखंड एवं उत्तर प्रदेश की ओर आने वाली हर बस , ट्रेन खचाखच भरी हुई है।लोग भागते दौड़ते अपने घर आ रहे है।कुछ लोग साल में एक बार लौटते है अपने जड़ों की ओर,रिश्तों की टूट-फूट के मरम्मती के लिए,माटी की सोंधी खुशबू को महसूस करने अपने बचपन की यादों का कलैंडर पलटने के लिए,गिल्ली-डंडा, सतखपड़ी,आइस-पाइस,गुलेल और आम लीची की के रस में डूबे बचपन को टटोलने के लिए,लाड़ से भीगी रोटी का स्वाद चखने।।माँ-बाबू के अलावा पड़ोस की सुगनी चाची,पंसारी रमेसर चाचा की झिड़की का आनंद लेने।

लोक आस्था के इस महापर्व का उल्लेख रामायण और महाभारत में भी मिलता है।ऐसी मान्यता है कि आठवीं सदी में औरंगाबाद(बिहार) स्थित देव जिले में छठ पर्व की परंपरागत शुरूआत हुई थी।

चार दिवसीय इस त्योहार में आस्था का ऐसा अद्भुत रंग अपने आप में अनूठा है।यह ऐसा एक त्योहार है जो कि बिना पुरोहित के सम्पन्न होता है।साफ-सफाई और शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है।घर तो जैसे मंदिर में तबदील हो जाता है।घर की रसोई में लहसुन-प्याज दिवाली के दिन से ही निषिद्ध हो जाता है।घर की हर चीज नहा-धोकर पूजा में सम्मिलित होने के लिए तैयार हो जाती है।

नहाय-खाय यानि त्योहार के प्रथम दिवस पर , व्रती महिला भोर में ही नहा धोकर पूरी शुचिता से लौकी में चने की दाल डालकर सब्जी और अरवा चावल का भात बनाती है।सेंधा नमक और खल में कूटे गये मसालों से जो प्रसाद बनता है उसका स्वाद अवर्णनीय  है।

घर पर ही गेहूँ बीनकर, धोकर सुखाया जाता है पूरे नियम से,जब तक गेहूँ न सूखे उपवास रखा जाता है।
बाज़ार हाट सूप, दौरा,सुप्ती,डाला ईख,जम्हेरी नींबू,केला,नारियल,अदरख,हल्दी,गाज़र लगे जड़ वाले पौधों और भी कई प्रकार के फलों से सज जाता है।सुथनी और कमरंगा जैसे फल भी होते है इसकी जानकारी छठ के बाज़ार जाकर पता चलता है।
दूसरे दिन यानि खरना के दिन व्रती महिलाएँ दिनभर निर्जल व्रत करके शाम को पूरी पवित्रता से गाय के दूध में चावल डाल कर खीर बनाती है कुछ लोग मिसरी तो कुछ गुड़ का प्रयोग करते है। शाम को पूजाघर में सूर्य भगवान के नाम का प्रसाद अर्पित कर,फिर खीर खुद खाती  है फिर बाकी सभी लोग पूरी श्रद्धाभक्ति से प्रसाद ग्रहण करते है।

तीसरे दिन सुबह से ही सब सूप,दौरा,डाला और बाजा़र से लाये गये फलों को पवित्र जल से धोया जाता है।फिर नयी ईंट जोड़कर चूल्हा बनाया जाता है आम की लकड़ी की धीमी आँच पर गेहूँ के आटे और गुड़ को मिलकार  प्रसाद बनाया जाता है जिसे 'ठेकुआ', 'टिकरी' कहते है।चावल को पीसकर गुड़ मिलाकर कसार बनाया जाता है,भक्तिमय सुरीले पारंपरिक गीतो को गाकर घर परिवार के हर सदस्य की खुशहाली,समृद्धि की प्रार्थना की जाती है। हँसते खिलखिलाते गुनगुनाते असीम श्रद्धा से बने प्रसाद अमृत तुल्य होते है।फिर,ढलते दोपहर के बाद सूप सजा कर सिर पर रख नंगे पाँव नदी,तालाब के किनारों पर इकट्ठे होते है सभी, व्रती महिलाओं के साथ अन्य सभी लोग डूबते सूरज को अरग देने।सुंदर मधुर गीत कानों में पिघलकर आत्मा को शुद्ध कर जाते है।नये-नये कपड़े पहनकर उत्साह और आनंद से भरे-पूरे,मुस्कुराते अपनेपन से सरोबार हर हाथ एक दूसरे के प्रति सम्मान और सहयोग की भावना से भरे जीवन के प्रति मोह बढ़ा देते है। शारदा सिन्हा के गीत मानो मंत्र सरीखे वातावरण को पूर्ण भक्तिमय बना देते है।

चौथे दिन सूरज निकलने के पहले ही सभी घाट पहुँच जाते है।उगते सूरज का इंतज़ार करते,भक्ति-भाव से सूर्य के आगे नतमस्तक होकर अपने अपनों लिए झोली भर खुशियाँ माँगते है।उदित सूर्य को अर्ध्य अर्पित कर व्रती अपना व्रत पूरा करती है।

प्रकृति को मानव से जोड़ने का यह महापर्व है जो कि आधुनिक जीवनशैली में समाजिक सरोकारों में एक दूसरे से दूर होते परिवारों को एक करने का काम करता है।यह होली,दशहरा की तरह घर के भीतर सिमटकर मनाया जाने वाला त्योहार नहीं,बल्कि एकाकी होती दुनिया के दौर में सामाजिक सहयोगात्मक रवैया और सामूहिकता स्थापित कर जड़ों को सींचने का प्रयास करता एक अमृतमय घट है।आज यह त्योहार सिर्फ बिहार या उत्तरप्रदेश ही नहीं अपितु इसका स्वरूप व्यापक हो गया है यह देश के अनेक हिस्सों में मनाया जाने लगा है।हिंदू के अलावा अन्य धर्माम्बलंबियों को इस त्योहार को करते देखने का सुखद सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ है।मैं स्वयं को भाग्यशाली मानती हूँ कि मुझे परंपरा में ऐसा अनूठा त्योहार मिला है।

#श्वेता🍁

                   *चित्र साभार गूगल*

sweta sinha जी बधाई हो!,

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